काल भैरव का चमत्कारी मंदिर, यहां साक्षात काल भैरव करते हैं मदिरा पान!

-करिश्मा राय तंवर

 

हमारे देश में अनेक ऐसे मंदिर हैं जिनके रहस्य आज भी अनसुलझे हैं। उन्हीं में से एक है उज्जैन में स्थित काल भैरव मंदिर..शहर से करीब 8 किमी दूर, क्षिप्रा नदी के तट पर कालभैरव मंदिर बना है। कहते हैं कि यह मंदिर लगभग छह हजार साल पुराना है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां भगवान कालभैरव की प्रतिमा को शराब का भोग लगाया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि देखते ही देखते वह पात्र जिसमें मदिरा का भोग लगाया जाता है, खाली हो जाता है। यह शराब कहां जाती है, ये आज भी रहस्य का विषय बना हुआ है.. यहां रोज श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और इस चमत्कार को अपनी आंखों से देखती है।

 

हजारों साल पुराना है मंदिर का इतिहास

यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर माना जाता है, जहां मास, मदिरा, बलि और मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। प्राचीन समय में यहां सिर्फ तांत्रिकों को ही आने की अनुमति थी। बाद में ये मंदिर आम लोगों के लिए खोल दिया गया था। यहां पर कुछ अर्से पहले तक जानवरों की बलि चढ़ाने की भी परंपरा थी। हालांकि अब यह प्रथा बंद कर दी गई है, लेकिन भगवान भैरव को मदिरा का भोग लगाने की परंपरा अब भी कायम है।

 

 

 

स्कंद पुराण में मंदिर निर्माण की कहानी

चार वेदों के रचयिता ब्रह्मा जी ने जब पांचवे वेद की रचना करने के बारे में सोचा तो उन्हें रोकने के लिए देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की। जब ब्रह्मा जी ने शिव की बात नहीं मानी तो क्रोध में उन्हों ने अपने तीसरे नेत्र से बटुक भैरव को प्रकट किया। बालक बटुक भैरव ने गुस्से में ब्रह्मा जी का पांचवां मस्तक काट दिया। जिससे उनपर ब्रह्म हत्या का पाप लगा। इस पाप दोष से मुक्त होने के लिए भैरव ने भगवान शिव की आराधना की, जिन्होंने बताया कि उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर ओखर श्मशान के पास तपस्या करने से उन्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती है।

 

 

देखते ही देखते खाली हो जाता है प्याला

मान्यता है कि उसी समय से यहां काल भैरव की पूजा हो रही है। कहते हैं उसके बाद यहां एक बड़ा मंदिर बनाया गया था, जिसका जीर्णोद्धार परमार वंश के राजाओं ने करवाया था। अब यहां जितने भी दर्शनार्थी आते हैं, बाबा को भोग जरूर लगाते हैं। मंदिर के पुजारी गोपाल महाराज बताते हैं कि यहां विशिष्ट मंत्रों के द्वारा बाबा को अभिमंत्रित कर उन्हें मदिरा का पान कराया जाता है, जिसे वे बहुत खुशी के साथ स्वीकार भी करते हैं और अपने भक्तों की मुराद पूरी करते हैं।

मदिरा के भोग का असली रहस्य क्या है ये कोई नहीं जान पाया, कई लोगों ने इस रहस्य को जानने की कोशिश जरूर की, कि आखीर मदिरा का पात्र मूर्ति के मुंह के पास जाते ही खाली कैसे हो जाता है, और सारी मदिरा जाती कहां है

 

 

 

खोजने पर भी नहीं मिला मदिरा पान का रहस्य्

कहते हैं कि मंदिर में जहां काल भैरव की मूर्ति के सामने झूले में बटुक भैरव की मूर्ति विराजमान है, एक अंग्रेज अधिकारी ने आजादी के पूर्व वहां आसपास की गहन खुदाई करवायी थी. ये खुदाई काफी गहराई तक करवायी गई थी लेकिन उसके बाबजूद भी इस रहस्य का पता नही लगया जा सका. उसके बाद वो अंग्रेज भी काल भैरव का भक्त बन गया.

 

 

 

मंदिर के पुजारी और साथ ही साथ वहां आने वाले भक्तों का कहना है कि देवता की मूर्ति के मुँह में जो संकरी दरार है उसमें किसी भी तरह का गुहा या छेद नहीं है, भैरव देवता खुद ही चमत्कारिक ढंग से मदिरा का प्रसाद के रूप में पान करते हैं…

वहीं कहा जाता है कालभैरव को शराब अर्पित करते समय हमारा भाव यही होना चाहिए कि हम हमारी समस्त बुराइयां भगवान को समर्पित करें और अच्छाई के मार्ग पर चलने का संकल्प करें। मंदिर की बाहरी दीवारों पर अन्य कई देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। इसके सभागृह के उत्तर में एक पाताल भैरवी नाम की एक छोटी सी गुफा भी है।

 

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