छत्तीसगढ़ में मौजूद मां दंतेश्वइरी का अद्भूद मंदिर, यहां देवी सती के गिरे थे दांत

-करिश्मा राय तंवर

 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में मौजूद दंतेश्वइरी मॉ मंदिर देवी को समर्पित 51 शक्ति पिथों में से एक माना जाता है. माना जाता है कि देवी सती की दांत यहां गिरा था.इसी पर इस इलाके का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। इस मंदिर को लेकर कई तरह की कहानियां प्रसिद्ध हैं.

 

 

राजधानी से करीब 380 किमी दूर दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित इस मंदिर के बनने की कहानी बहुत रोचक है। कहते हैं इस मंदिर का निर्माण महाराजा अन्नमदेव ने चौदहवीं शताब्दी में किया था। वारंगल राज्य के प्रतापी राजा अन्नमदेव ने यहां आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और मां भुवनेश्वरी देवी की स्थापना की।

 

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कहानी

एक दंतकथा के मुताबिक अन्नमदेव जब मुगलों से पराजित होकर जंगल में भटक रहे थे तो कुलदेवी ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि माघ पूर्णिमा के मौके पर वे घोड़े पर सवार होकर विजय यात्रा प्रारंभ करें। वे जहां तक जाएंगे, वहां तक उनका राज्य होगा और स्वयं देवी उनके पीछे चलेंगी। लेकिन पीछे मुड़कर मत देखना।

 

वरदान के अनुसार राजा ने अपनी यात्रा प्रारंभ की। राजा अपने पीछे चली आ रही माता का अनुमान उनके पायल की घुंघरुओं से कर रहे थे। शंखिनी और डंकिनी की त्रिवेणी पर नदी की रेत में देवी के पैरों की घुंघरुओं की आवाज रेत में दब जाने के कारण बंद हो गई तो राजा ने पीछे मुड़कर देख लिया। इसके बाद देवी वहीं ठहर गईं। कुछ समय बाद मां दंतेश्वरी ने राजा के स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि मैं शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम पर स्थापित हूं। कहा जाता है कि मां दंतेश्वरी की प्रतिमा प्राकट्य मूर्ति है और गर्भगृह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित है। शेष मंदिर का निर्माण कालांतर में राजा ने किया।

 

देवी की षष्टभुजी मूर्ति स्थापित

यहां देवी की षष्टभुजी काले रंग की मूर्ति स्थापित है। छह भुजाओं में देवी ने दाएं हाथ में शंख, खड्ग, त्रिशूल और बांए हाथ में घटी, पद्घ और राक्षस के बाल धारण किए हुए हैं। मंदिर में देवी के चरण चिन्ह भी मौजूद हैं। यह मूर्ति नक्काशीयुक्त है और ऊपरी भाग में नरसिंह अवतार का स्वरुप है।

वहीं मंदिर के सामने एक स्तंभ भी मौजूद है जिसे लेकर मान्यता है कि जिसका हाथ पीछे तरफ से मिल जाता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

 

देवी दंतेश्वरी की डोली

  • होली से दस दिन पहले यहां नौ दिवसीय फाल्गुन मड़ई का आयोजन होता है
  • जिसमें आदिवासी संस्कृति की विश्वास व परंपरा की झलक दिखाई देती है।
  • 250 से अधिक देवी-देवताओं के साथ देवी दंतेश्वरी की डोली हर दिन नगर भ्रमण पर निकलती हैं।
  • इस दौरान नाच मंडली की रस्म अदायगी की जाती है,
  • वहीं श्रद्धालु देवी का दर्शन कर अपनी मन्नतें मांगते हैं।

 

माना जाता है कि मंदिर में पहले नर और पशुबलि दी जाती थी, लेकिन 18वीं शताब्दी में बलि पर रोक लगा दी गई। मंदिर के गर्भगृह में किसी जीव की बलि नहीं दी जाती है, लेकिन नवरात्र के दौरान यहां पंचमी की रात गुप्त पूजा के दौरान रखिया कुम्हड़े यानी कद्दू की बलि दी जाती है. मंदिर के मुख्य पुजारी यह पूजा-अनुष्ठान अपने करीबी सहयोगियों की मौजूदगी में आधी रात को संपन्न करते हैं। इस दौरान अन्य लोगों का मंदिर में प्रवेश वर्जित होता है।

 

 

जिले के नक्सली इलाके में घोर जंगल और पहाड़ों के बीच स्थित ये मंदिर 137 सालों से 32 मोटे खंभों पर टिका है। इस मंदिर में सिले हुए वस्त्रों को पहनकर जाने की मनाही है। यहां पुरुषों को धोती या लुंगी लगाकर ही प्रवेश करने दिया जाता है।

 

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