भारत ताइवान की ट्रेड डील, चीन परेशान

लद्दाख में एलएसी पर पिछले कुछ महीनों से गंभीर विवाद बना हुआ है। दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं। भारत में कांग्रेस के राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं का आरोप है कि चीन ने भारतीय सीमा का उल्लंघन किया है और उसकी सेनाएं लद्दाख के भारतीय हिस्से में काफी अंदर तक घुस आई हैं। विपक्षी नेता केंद्र की मोदी सरकार पर चीनी फौजों को बाहर खदेड़ने में नाकाम रहने और देश के लोगों से सच्चाई छिपाने जैसे कड़े आरोप लगा रहे हैं। दूसरी तरफ भारत कूटनीतिक और व्यापार के स्तर पर भी चीन को झटका देने की कोशिश कर रहा है। इस मुहिम के तहत बड़े पैमाने पर चाइनीज़ ऐप्स को देश में प्रतिबंधित कर दिया गया है। इंफ्रा और दूसरे टेंडरों में चीनी कंपनियों को हतोत्साहित किया जा रहा है। चीन की टेक और टेलीकॉम गीयर बनाने वाली कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में काम करना अब पहले जैसा आसान नहीं रह गया है। चीन को टक्कर देने के लिए कूटनीतिक स्तर पर भारत ने यूएस, ऑस्ट्रेलिया, जापान के साथ साझेदारी बढ़ाई है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण संकेत भारत और ताइवान के संबंधों का और मज़बूत होना है। ताइवान के साथ भी चीन के रिश्ते तनावपूर्ण दौर में हैं। ताइवान को चीन एक अलग देश के तौर पर नहीं देखता है। मोदी सरकार ताइवान के साथ एक ट्रेड डील करने का मन बन रही है।
लंबे वक्त तक चीन की नाराज़गी से बचने के लिए भारत ने ताइवान के साथ किसी तरह का व्यापार समझौता करने से परहेज़ किया है। ताइवान के साथ ट्रेड डील करने से भारत इस वजह से बचता रहा है।
ऐसे समझौते दोनों देशों के लिए फायदेमंद
रिसर्च एंड इंफ़ोर्मेशन सिस्टम फ़ॉर डिवेलपिंग कंट्रीज (आरआईएस) के प्रोफ़ेसर डॉ. प्रबीर डे कहते हैं, “ट्रेड एग्रीमेंट में कोई बुराई नहीं है. ऐसे समझौते दोनों देशों के लिए फायदेमंद होते हैं. ताइवान के दुनिया के कई देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट हैं और भारत के साथ भी ऐसा एग्रीमेंट हो सकता है.”। हालांकि, वे कहते हैं कि दोनों देशों के बीच जनरल ट्रेड एग्रीमेंट किया जा सकता है। लेकिन, ताइवान किसी भी देश के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) नहीं कर सकता है।

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