तमिलनाडु में स्थित चमत्कारी मंदिर, यहां हर सीढ़ी को छूने पर आती है अलग ध्वनि!

करिश्मा राय

 

भारत में कई मंदिर मौजूद है और हर मंदिर से जुड़ी अलग मान्यता है। मंदिर की सीढ़ियो पर चढ़कर आपने भगवान के दर्शन तो जरुर किए होंगे लेकिन क्या आपने कभी मंदिर की सीढ़ियों से संगीत को सुना है। अगर नहीं, तो आप दक्षिण भारत के एरावतेश्वर मंदिर जरुर जाइए क्योंकि इस मंदिर की हर सीढ़ी पर जब आप चढ़ेगे तो आपको एक अलग ध्वनि सुनाई देगी।तमिलनाडु में स्थिंत एरावतेश्वर मंदिर को 12वीं सदी में चोल राजाओं ने बनवाया था। यह मंदिर महान जीवंत चोल मंदिरों के रूप में जाना जाता है।

 

चोल राजाओं द्वारा निर्मित भव्य मंदिर एरावतेश्वर

इतिहास के कई साक्ष्यों में चोल राजाओं को सूर्यवंशी कहकर भी वर्णित किया गया है। अशोक काल के कई अभिलेखों में चोल राजाओं के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त होती है। जैसे-जैसे चोलों की शक्ति बढ़ती गई उन्होंने अपने गौरव और एश्वर्य को प्रदर्शित करने के लिए कई कार्य करने शुरू किए, जिनमें एक मंदिर निर्माण भी था।

 

 

एरावतेश्वर मंदिर की नक्काशी दर्शनार्थियों को बहुत भाती है। खासतौर पर यहां की तीन सीढ़ियां, जिन्हें इस प्रकार बनाया गया है कि इनपर जरा सा भी तेज पैर रखने पर संगीत की अलग-अलग ध्व्नि सुनाई देने लगती है। हालांकि इन सीढ़ियों को किसी तरीके का नुक्सान ना पहुंचे इसे ध्यान में रखते हुए  इन सीढ़ियों को लोहे के जाल ढक दिया गया है।

 

 

मंदिर के आंगन के दक्षिण पश्चिमी कोने में 4 तीर्थ वाला एक मंडप है। जिनमें से एक पर यम की छवि बनी है। इसके साथ ही इसे यूनेस्को की ओर से वैश्विक धरोहर स्थसल भी घोषित किया गया है।ऐरावतेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। भगवान शिव को यहां एरावतेश्वर के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस मंदिर में देवताओं के राजा इंद्र के सफेद हाथी एरावत द्वारा भगवान शिव की पूजा की गई थी।

 

 

मंदिर से जुड़ी कहानियां

मान्याता है कि ऐरावत हाथी सफेद था लेकिन ऋषि दुर्वासा द्वारा इंद्र का यह हाथी श्रापित था, श्राप के कारण हाथी का रंग बदल गया था. अपना रंग वापस पाने के लिए उसने इसी स्थान पर शिव जी की पूजा की थी. इस वजह से इस मंदिर का नाम एरावतेश्वर मंदिर पड़ गया। कहा जाता है कि मृत्यु के राजा यम ने भी यहाँ शिव की पूजा की थी।

 

मृत्यु के राजा यम  की होती है पूजा

यम किसी ऋषि के शाप के कारण पूरे शरीर की जलन से पीड़ित थे, ऐरावतेश्वर भगवान द्वारा ठीक कर दिए गए। यम ने पवित्र तालाब में स्नान किया और अपनी जलन से छुटकारा पाया। तब से उस तालाब को यमतीर्थम के नाम से जाना जाता है।

 

 

इस मंदिक की खास बात यह है कि आस्था के साथ मनोरंजन को ध्यान में रखकर  भी इस मंदिर का निर्माण किया गया था. मंदिर के दक्षिणी भाग को पत्थर के एक विशाल रथ का रूप दिया गया है, जब आप इसे देखेंगे तो आपको लगेगा कि इस पत्थरनुमा रथ को घोड़े खींच रहे हैं.

 

द्रविड़ वास्तुकला का अनूठा उदाहरण

एरावतेश्वर मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का एक अनूठा उदाहरण है। अगर आप इस मंदिर को चारों तरफ से देखें तो पता चलेगा कि इस पूरे मंदिर को स्थापत्य कला से सजाया गया है। मंदिर की दीवारों, छतों पर आकर्षक नक्काशी का खूबसूरत प्रयोग किया गया है।

 

 

मंदिर की हर एक चीज़ इतनी खूबसूरत और आकर्षक है कि इसे देखने के लिए वक्त के साथ ही समझ भी चाहिए। मंदिर के बरामदे पर 108 खंड के शिलालेख मौजूद हैं जिनपर शिव संतों यानी शिवाचार्यों के नाम अंकित हैं। इस मंदिर को 2004 में महान चोल मंदिरों में शामिल किया गया था। दक्षिण भारत में मौजूद ये मंदिर द्रविण वास्तुकला का उत्तम नमूना है और इसलिए विदेशी सैलानी भी इस मंदिर के दर्शन करने जरुर आते है।

 

 

 

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