-विनोद कुमार, संवाददाता

धारा 370 के खंड एक को छोड़ कर पूरी निरस्त करने और 35 ए को हटाए जाने के बाद कई वर्गो ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर आजादी की उड़ान भरी है। पांच अगस्त को एक साल पूरा हो जाएगा। ठीक पांच अगस्त 2019 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में धारा 370 में संशोधन और रियासत के दोबारा गठन को लेकर बिल पेश कर और पारित होते ही गुलामी की जंजीरों कर कड़िया खुल गई और आजादी के पंक्षी ने लंबी उड़ान भरी।

वाल्मिकी समाज वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी बाजीगर और गोरखा बिरादरी के लिये पांच अगस्त 15 अगस्त की तरह स्वतंत्रता दिवस के जैसे है। कई दशकों से यह सभी समाज मानवाधिकारों के हनन का शिकार हो रहे थे। किसी भी सियासी जमात ने हाथ पकडने का प्रयास नहीं किया। वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी की बात करे तो जो रियासत जम्मू कश्मीर के उस पार चला गया उसको सभी अधिकार मिले, लेकिन जो लखनपुर पार नहीं पाया उसको मताधिकार भी नहीं मिला।

लोकसभा के चुनावों में वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों को वोट डालने का अधिकार रहता है। बाकी किसी भी चुनाव में मताधिकार नहीं है। सौभाविक सी बात है कि लोकसभा के चुनावों में ही नेताओं और सियासी पार्टियों को वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों की याद आती रही है। वोट बैंक की तरह हर पार्टी ने वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों का इस्तेमाल किया। लेकिन एक बात जरूर है कि पीएम मोदी ने 2014 में अपने चुनाव प्रचार के दौरान वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों से वादा किया था जिसको पांच अगस्त 2019 को पूरा किया गया।

वाल्मिकी समाज और गोरखा बिरादरी भी कश्मीर केंद्रित राजनीति ने अपनी यातनाओं का शिकार बनाया। वाल्मिकी समाज 1957 में जम्मू कश्मीर लाया गया था। जम्मू कश्मीर के स्थानीय सफाई कर्मियों ने हड़ताल कर दी थी, तत्कालीन पीएम ने पंजाब के वाल्मिकी समाज को जम्मू आने का न्यौता दिया था। रियासती बाशिंदों की तरह हर सुविधाएं भी देने का वादा किया। असल में कश्मीरी हुकूमरानों ने वादा खिलाफी की और वाल्मिकी समाज के मानवाधिकारो के हनन का सिलसिला शुरू कर दिया। यह सिलसिला लगातार छह दशकों तक चला। पांच दिसंबर 2019 को ही निजात मिली। गोरखा बिरादरी महाराजा गुलाब सिंह के जमाने से रियासत जम्मू कश्मीर में है। उनको भी कई दशकों तक संघर्ष करना पड़ा है। फिर अखिर क्यों नहीं यह लोग पांच अगस्त को आजादी का दिन मनाएं।

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