मिशन पर जाने से पहले जवान करते हैं इस मंदिर के दर्शन, मां काली को समर्पित प्रसिद्ध मंदिर

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-नीलम रावत, संवाददाता

 

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है. हजारों मंदिर इस स्थान पर मौजूद है. दूर-दराज से भक्त देवभूमि में मौजूद प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करने आते हैं. लेकिन इसी देवभूमि पर एक मंदिर ऐसा भी है जहां युद्ध या अपने मिशन पर जाने से पहले सैनिक आकर अपना माथा टेकते हैं और मां काली का आशीर्वाद लेकर जाते हैं.

 

 

ये मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित मां कालिका का मंदिर है. देवदार के पेड़ों से घिरे हुए हाट कालिका मंदिर की घंटियों से लेकर यहां के धर्मशालाओं में किसी न किसी आर्मी अफसर का नाम मिल जाएगा, क्योंकि यहां की देवी को कुमाऊं रेजीमेंट अराध्य देवी के रूप में पूजता है. उत्तराखंड में पिथौरागढ़ ज़िले के गंगोली हाट मंदिर में साल भर आम लोगों के साथ ही कुमाऊं रेजीमेंट के जवानों और अफसरों की भीड़ लगी रहती है.

 

यहां विश्राम करती हैं मां

 

 

हाट कालिका मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां पर मां काली विश्राम करती है. यही कारण है कि शक्तिपीठ के पास महाकाली का बिस्तर लगाया जाता है. सुबह के समय इस बिस्तर पर सिलवटें पड़ी होती हैं, जो संकेत देती है कि यहां पर किसी ने विश्राम किया था. मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से महाकाली के चरणों में श्रद्धापुष्प अर्पित करता है वह रोग, शोक और दरिद्रता से दूर हो जाता है.

 

कुमाऊं रेजिमेंट की आराध्य मां कालिका

 

 

कुमाऊं रेजिमेंट की आराध्य देवी होने के पीछे भी एक कहानी जुड़ी हुई है दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के समय जब भारतीय सेना का जहाज डूबने लगा. तब सैन्य अधिकारियों ने जवानों से अपने-अपने भगवान को याद करने का कहा जब कुमाऊं के सैनिकों ने जैसे ही हाट काली का जयकारा लगाया वैसे ही जहाज किनारे आ गया. तभी से कुमाऊं रेजीमेंट ने मां काली को आराध्य देवी की मान्यता दे दी, जब भी कुमाऊं रेजीमेंट के जवान युद्ध के लिए जाते हैं तो काली मां के दर्शन के बिना नहीं जाते हैं.

 

1971 में पाकिस्तान के साथ छिड़ी जंग के बाद कुमाऊं रेजीमेंट ने सूबेदार शेर सिंह के नेतृत्व में महाकाली की मूर्ति की स्थापना हुई थी. इसके बाद 1994 में कुमाऊं रेजीमेंट ने ही मंदिर में महाकाली की बड़ी मूर्ति चढ़ाई है.

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