एक क्लर्क से देश के राष्ट्रपति बनने की कहानी, पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश से प्रणब मुखर्जी का खास रिश्ता, जानिए शून्य से शिखर तक की पूरी कहानी

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रवि श्रीवास्तव

प्रणब मुखर्जी राजनीति में आने से पहले एक क्लर्क, एक पत्रकार और एक राजनीति के अध्यापक भी रहे हैं, उनकी पत्नी बांग्लादेश की हैं,ऐसे ही तमाम रोचक बातें हैं जो प्रणब दा के विराट व्यक्तित्व की गवाही देती हैं

राजनीति के अजातशत्रु, पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न प्रणब मुखर्जी के निधन पर शोक संवेदना देने वालों का तांता लगा हुआ है, 84 साल के प्रणब मुखर्जी दुनिया भले ही छोड़ गए हैं, लेकिन उन्होंने अपने सियासी सफर के दौरान  ऐसी अमिट छाप छोड़ी है, जिसकी चर्चाएं कई दशकों तक होंगी। प्रणब मुखर्जी भारतीय राजनीति के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं, जिनका सम्मान सभी दलों के सदस्य एक समान करते हैं और प्यार से उन्हें प्रणब दा बुलाते हैं। मोदी सरकार ने पिछले साल उन्हें भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित किया था। लेकिन ये सब संभव कैसे हुआ और आखिर कैसे प्रणब मुखर्जी का सियासी सफर शिखर तक पहुंचा वो समझिए

प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले के मिराती नामक गांव में हुआ था। प्रणब मुखर्जी 13 जुलाई, 1957 को सुव्रा मुखर्जी के साथ परिणय सूत्र में बंधे, जो बांग्लादेश में स्थित नरायल की रहने वाले थीं और 10 वर्ष की उम्र में अपने परिवार के साथ तत्कालीन कोलकाता जो अब कलकत्ता के नाम से जाना जाता है, प्रणब मुखर्जी की शिक्षा का दौर कोलकाता में भी गुजरा था

कभी क्लर्क, तो कभी पत्रकार थे प्रणब मुखर्जी

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद प्रणब मुखर्जी कलकत्ते में ही पोस्ट एंड टेलिग्राफ विभाग में अपर डिविजन क्लर्क थे। प्रणब दा ने 1963 में पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में स्थित विद्यानगर कॉलेज में कुछ समय के लिए राजनीति शास्त्र भी पढ़ाया। उन्होंने कुछ समय के लिए ‘देशेर डाक’ नामक समाचार पत्र में पत्रकार की भूमिका भी निभाई।

क्लर्क से राष्ट्रपति बनने की कहानी…

राजनीति पढ़ाने के माहिर प्रणब मुखर्जी की राजनीति समझ से ही प्रभावित होकर 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का सदस्य बना दिया। इसी साल जुलाई में प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस ने राज्यसभा भेज दिया। और इस तरह प्रणब मुखर्जी का राजनीति में औपचारिक रूप से प्रवेश हुआ।

ऐसा रहा प्रणब मुखर्जी का सियासी सफर

प्रणब दा साल 1969 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर पहली बार उच्च सदन यानी राज्यसभा पहुंचे

फरवरी 1973 से जनवरी 1974 तक वह ‘इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट मिनिस्टर’ रहे

अक्टूबर 1974 से दिसंबर 1975 तक वह ‘वित्त राज्य मंत्री’ रहे।

साल 1978 से 1980 तक वह राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के उप नेता रहे

80-90 के दशक में वे लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की कैम्पेन कमिटी के चेयरमैन रहे

 प्रणब मुखर्जी कुल 5 बार राज्यसभा और 2 बार लोकसभा सदस्य रहे हैं

प्रणब दा साल 2004 में पहली बार चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे

साल 2009 में वे दोबारा लोकसभा से सांसद चुनकर सदन में पहुंचे

23 मई 2004 से 24 अक्टूबर 2006 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे

प्रणब दा ने 25 जून 2012 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया और 2012 से 2017 तक भारत के 13वीं राष्ट्रपति रहे। इस प्रकार राष्ट्रपति बनने के साथ ही प्रणब दा का लगभग 45 वर्ष लंबे राजनीतिक करियर पर विराम लगा। लंबे सियासी अनुभव और उनके योगदान को देखते हुए मोदी सरकार ने प्रणब मुखर्जी को साल 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया

 

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