बिहार चुनाव में लोजपा और रलोसपा की भूमिका पर संशय बरकरार…कहां तक जाएगी ये तकरार ?

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रवि श्रीवास्तव 

बिहार चुनाव में सीटों को लेकर दोनों ही बड़े गठबंधन में गांठे सुलझने का नाम नहीं ले रही। एक तरफ एनडीए से चिराग पासवान की पार्टी लोजपा भागी तेवर दिखाकर आंखे दिखा रही है। तो वहीं महागठबंधन की मुश्किलें उपेंद्र कुश्वाहा ने बढ़ा रखी है, दोनों ही पार्टी संकेत तो यही दे रही है कि  सम्मान नहीं मिला तो राहें अलग होगी।

कुलमिलाकर बिहार में एनडीए और महागठबंधन दोनों की गांठ कमजोर होती दिख रही है। एनडीए में जहां लोजपा तो महागठबंधन में रालोसपा के तेवर ढीले होते नहीं दिख रहे हैं। लोजपा को सीटों वाला सम्मान चाहिए तो वहीं रलोसपा को कहना है कि तेजस्वी का नेतृत्व उन्हें मंजूर नहीं हैं क्योंकि बतौर सीएम के चेहरे पर अगर तेजस्वी मैदान में उतरेंगे तो महागठंबधन का प्रदर्शन दुरुस्त नहीं होगा

इस पूरे मामले पर लोजपा की तरफ से आए एक बयान ने सियासी हलचल और बढ़ा दी है, दरअसल लोजपा ने कहा है कि बिहार की जनता 15 साल बनाम 15 साल के सरकारों को देख चुकी है। इस बार वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में जनता एक बेहतर विकल्प ढूंढ़ रही है।मतलब ये चिराग पासवान की पार्टी तीसरे मोर्चे को खोलने की तैयारी भी कर रही है

एक तरफ तो चिराग पासवान सार्वजनिक तौर पर ये कह चुके हैं कि  हमारे हर कार्यकर्ता की इच्छा है कि विधानसभा के चुनाव में लोजपा 143 सीटों पर लड़े। चिराग पासवान राष्ट्रीय राजनीति को छोड़कर प्रदेश की राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हों। ताकि बिहार को एक सच्चा और मेहनतकस जनसेवक मिल सके।वहीं उपेंद्र कुशवाहा ने कहा है कि महागठबंधन में अभी जो परिस्थिति है, उस पर विचार करते हुए पार्टी ने मुझे अधिकृत किया है। मैं सोच समझकर बिहार की जनता और अपने कार्यकर्ताओं के हित का ख्याल करते हुए निर्णय लूंगा। यानि आने वाले वक्त में गठबंधन की गांठ सुलझेगी या गांठे और उलझेगी ये आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा

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