मां की एक झलक से दूर होती हैं तकलीफें, तीन धर्मों की आस्था का केंद्र ये मंदिर

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-नीलम रावत, संवाददाता

देवी मां भक्तों की समस्त समस्याओं का निवारण करती है. कहते हैं कि मां के एक दर्शन मात्र से भक्तों की सारी दुख-तकलीफें दूर हो जाती है. ऐसा ही एक मंदिर देवभूमि हिमाचल प्रदेश में मौजूद है. जहां मां के दर्शन मात्र से भक्तों की समस्याओं का निदान हो जाता है. इस मंदिर का नाम है ब्रजेश्वरी माता मंदिर.

51 शक्तिपीठों में शामिल मंदिर

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में मां का विश्व प्रसिद्ध मंदिर मौजूद है. मां के शक्तिपीठों में से एक मां ब्रजेश्वरी देवी के धाम के बारे मे कहते हैं कि जब मां सती ने पिता राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया और शिव के अपमान से दुखी होकर माता सती ने हवनकुंड में अपने प्राण त्याग दिए.

तब क्रोधित शिव उनकी देह को लेकर पूरी सृष्टि में घूमे. शिव का क्रोध शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए. शरीर के यह टुकड़े धरती पर जहां-जहां गिरे वह स्थान शक्तिपीठ कहलाया. मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था इसलिए ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ में मां के वक्ष की पूजा होती है.

तीन धर्मों की आस्था का केंद्र

माता ब्रजेश्वरी का ये मंदिर ना सिर्फ हिंदू धर्म की आस्था का केंद्र है बल्कि यहां मुस्लिम और सिख श्रद्धालु भी शीश झुकाने आते हैं. कहते हैं ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के तीन गुंबद इन तीन धर्मों के प्रतीक हैं. पहला हिन्दू धर्म का प्रतीक है, जिसकी आकृति मंदिर जैसी है तो दूसरा मुस्लिम समाज का और तीसरा गुंबद सिख संप्रदाय का प्रतीक है.

तीन गुंबद वाले और तीन संप्रदायों की आस्था का केंद्र कहे जाने वाले माता के इस धाम में मां की पिण्डियां भी तीन ही हैं. मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित यह पहली और मुख्य पिण्डी मां ब्रजरेश्वरी की है. दूसरी मां भद्रकाली और तीसरी और सबसे छोटी पिण्डी मां एकादशी की है.

हर मनोकामना होती है पूरी

मान्यता है कि जो भी भक्त मन में सच्ची श्रद्धा लेकर मां के इस दरबार में पहुंचता है उसकी कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती. फिर चाहे मनचाहे जीवनसाथी की कामना हो या फिर संतान प्राप्ति की लालसा. मां अपने हर भक्त की मुराद पूरी करती हैं. मां की एक झलक मात्र से ही भक्तों की सभी दुख-तकलीफों का निवारण हो जाता है.

पांच बार होती है आरती

मां के इस दरबार में पांच बार आरती का विधान है, जिसका गवाह बनने की ख्वाहिश हर भक्त के मन में होती है. सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले मां की शैय्या को उठाया जाता है. उसके बाद रात्रि के श्रृंगार में ही मां की मंगला आरती की जाती है. मंगला आरती के बाद मां का रात्रि श्रृंगार उतार कर उनकी तीनों पिण्डियों का जल, दूध, दही, घी, और शहद के पंचामृत से अभिषेक किया जाता है. उसके बाद पीले चंदन से मां का श्रृंगार कर उन्हें नए वस्त्र और सोने के आभूषण पहनाएं जाते हैं.

यहां, दोपहर की आरती और भोग चढ़ाने की रस्म को गुप्त रखा जाता है. दोपहर की आरती के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, तब श्रद्धालु मंदिर परिसर में ही बने एक विशेष स्थान पर अपने बच्चों का मुंडन करवाते हैं. मान्यता है कि यहां बच्चों का मुंडन करवाने से मां बच्चों के जीवन की समस्त आपदाओं को हर लेती हैं.

मंदिर परिसर में भैरव की अनोखी मूर्ति

मंदिर परिसर में ही भगवान भैरव का भी मंदिर है. इस मंदिर में महिलाओं का जाना पूरी तरह से वर्जित हैं. यहां विराजे भगवान भैरव की मूर्ति बड़ी ही खास है कहते हैं जब भी कांगड़ा पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो इस मूर्ति की आंखों से आंसू और शरीर से पसीना निकलने लगता है. तब मंदिर के पुजारी विशाल हवन का आयोजन कर मां से आने वाली आपदा को टालने का निवेदन करते हैं. यह ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ का चमत्कार और महिमा ही है आने वाली हर आपदा मां के आशीर्वाद से टल जाती है.

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