यहां होती है भगवान शिव के मुख की पूजा, 6 महीने के लिए खुलते हैं कपाट

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-नीलम रावत, संवाददाता

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा. हर राज्य के छोटे- छोटे क्षेत्रों में थोड़ी-थोड़ी दूर पर या फिर यूँ कहें कि हर 5 आदमी पर एक मंदिर स्थापित हैं. महादेव के 12 ज्योर्तिलिंग तो सब जानते हैं लेकिन भगवान शिव के पंच केदार मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है.

इन्ही पंच केदार में से एक उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थापित रुद्रनाथ का मंदिर है. रुद्रनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित धार्मिक स्थल है, जो पंचकेदारों में से एक केदार कहलाता है. तीसरे केदार के रूप में रुद्रनाथ को पूजा जाता है.

शिव के मुख की होती है पूजा

समुद्रतल से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर भव्य प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है. इस मंदिर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि, इस मंदिर में भगवान शिव के मुख की पूजा होती है. शिव के मुख की पूजा रुद्रनाथ के अलावा उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में की जाती है. यहाँ पूजे जाने वाले शिव जी के मुख को नीलकंठ महादेव कहते हैं.

रुद्रनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था. भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पांडवों ने इस धाम का निर्माण करवाया था.

गोपेश्वर से शुरू होती है यात्रा

रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा गोपेश्वर से शुरू होती है. उत्तराखंड के हिल स्टेशनों में एक गोपेश्वर, ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर के लिए लोकप्रिय है. इस मंदिर में भगवान शिव का त्रिशूल आकर्षण का केंद्र है. रुद्रनाथ की यात्रा के दौरान भक्तगण गोपीनाथ मंदिर में रखे त्रिशूल के दर्शन करना नहीं भूलते.

गोपेश्वर से फिर सगर गाँव तक की यात्रा की जाती है, और यहां से रुद्रनाथ के लिए भक्त पैदल यात्रा करते हैं. भगवान शिव के इस धाम की यात्रा अत्यंत ही कठिन है. सभी केदारों में से रुद्रनाथ की यात्रा को सबसे कठिन माना जाता है. कठिन रास्तों को दरकिनार करे भोले बाबा के भक्त बम बम भोले के जयकारे लगाते हुए रुद्रनाथ धाम तक पहुंच ही जाते हैं.

6 महीने के लिए खुलते हैं कपाट

रुद्रनाथ के कपाट, परंपरा के अनुसार खुलते-बंद होते हैं. सर्दियों के मौसम में 6 महीने के लिए भगवान रुद्रनाथ गोपेश्वर में विराजमान होते हैं. 6 महीने भगवान शिव की पूजा गोपीनाथ मंदिर में ही की जाती है. 6 महीने के बाद दोबारा भगवान की डोली धूमधाम के साथ रुद्रनाथ मंदिर में लाई जाती है.

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