रथ के आकार में बना ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर, जानें इसकी खासियत!

करिश्मा

 

वैदिक काल से ही भारत में सूर्य की पूजा का प्रचलन रहा है। पहले यह साधना मंत्रों के माध्यम से हुआ करती थी लेकिन बाद में उनकी मूर्ति पूजा भी प्रारंभ हो गई.. जिसके बाद तमाम जगह पर उनके भव्य मंदिर बनवाए गए…भगवान सूर्य का एक ऐसा ही मंदिर ओडिशा में स्थित है जिसे यूनेस्को की विश्व धरोहर में भी शामिल किया गया है.

 

उड़ीसा राज्य के पवित्र शहर पुरी के पास कोणार्क का सूर्य मंदिर स्थित है। यह भव्य मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है और भारत का प्रसिद्घ तीर्थ स्थल है। सूर्य देवता के रथ के आकार में बनाया गया यह मंदिर भारत की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा उदाहरण है। यहाँ के सभी पत्थरों पर की गई अद्भुत नक्काशी के लिए लिए भी यह सूर्य मंदिर जाना जाता है.

इस सूर्य मंदिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने 13वीं शताब्दी में करवाया था। यह मंदिर अपने विशिष्ट आकार और शिल्पकला के लिए दुनिया भर में जाना जाता है…जब कभी भी परंपरा, रीति-रिवाज और इतिहास की बात आती है तो भारत का हर एक मंदिर लोगो को आकर्षित करता है। कोणार्क सूर्य मंदिर में उन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में लोग भगवान के दर्शन करने आते हैं बल्कि इस मंदिर की सरंचना को देखने भी दूर दराज से यहां लोग आते हैं.

कोणार्क मंदिर में मुख्य आकर्षण

  • इस मंदिर का मुख्य आकर्षण रथ में बने 12 पहियों की जोड़ी है.
  • ये पहिये कोई साधारण पहिये नही है क्योकि ये पहिये हमें सही समय बताते है.
  • इन पहियो को धूपघड़ी भी कहा गया है.
  • पहियों की परछाई से समय का अंदाजा लगा सकता है.
  • कोणार्क मंदिर के प्रवेश भाग पर ही दो बड़े शेर बनाये गए है.
  • हर एक शेर को हाथी का विनाश करते हुए बताया गया है.
  • उस दृश्य में शेर गर्व का और हाथी पैसों का प्रतिनिधित्व कर रहे है.
  • इसे मनुष्य की घमंड और अहंकार की समस्या से जोड़कर दिखाया गया है.

 

सूर्य देवता के रथ के आकार में बने कोणार्क के इस मंदिर में भी पत्थर के पहिए और घोड़े हैं, साथ ही इन पर उत्तम नक्काशी भी की गई है। ऐसा शानदार मंदिर विश्व में शायद ही कहीं हो! इसीलिए इसे देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक आते हैं। यहाँ की सूर्य प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में सुरक्षित रखी गई है और अब यहाँ कोई भी देव मूर्ति नहीं है।

कोणार्क मंदिर से जुड़ी पौराणिक कहानी

पुराणों के अनुसार, श्रीकृष्ण के बेटे सांब को एक शाप के कारण कोढ़ रोग हो गया था. तब उसने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के तट पर कोणार्क में सूर्यदेव की तपस्या की थी. सूर्यदेव को सभी रोगों का नाशक माना जाता है. सांब की तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें रोग मुक्त किया. रोग से छुटकारा पाने के बाद जब सांबदेव ने चंद्रभागा नदी में स्नान किया तो नहाते समय उन्हें सूर्यदेव की एक मूर्ति नदी में मिली. मूर्ति मिलने के बाद सांब ने उसी स्थान पर सूर्यदेव का मंदिर बनवाने का निर्णय लिया और इस तरह कोणार्क का सूर्य मंदिर बना.स्नान के समय सांब को जो सूर्यदेव की मूर्ति मिली, उस मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि उस मूर्ति का निर्माण देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने सूर्यदेव के शरीर के भाग से ही किया था.

इस मंदिर का पुर्ननिर्माण गंग वंश के राजा नरसिम्हा देव प्रथम ने लगभग 1278 ई. में करवाया था. इसके निर्माण में 1200 कुशल शिल्पियों ने 12 साल तक लगातार काम किया.कोणार्क सूर्य मंदिर भारत का इकलौता सूर्य मन्दिर है जो पूरी दुनिया में अपनी भव्यता और बनावट के लिए जाना जाता है. इस मंदिर को देखने लोग दूर दराज से आते हैं और यूनेस्को में शामिल इस विश्व धरोहर का दीदार कर जाते हैं.

Share