नवरात्र के चौथे दिन होती है मां कुष्मांडा की पूजा, मां की उपासना करने से रोग होते हैं दूर

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-नीलम रावत, संवाददाता

 

कुष्मांडा देवी नवदुर्गा का चौथा स्वरुप हैं. अपनी हल्की हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा पड़ा है. मां को ब्रह्मांड की रचना के कारण ही आदिस्वरुपा के नाम से भी जाना जाता है. आठ भुजाओं के कारण मां कुष्मांडा अष्टभुजा के नाम से भी प्रसिद्ध है.

 

देवी कुष्मांडा आदिशक्ति का चौथा स्वरूप हैं. पुराण में बताया गया है कि प्रलय से लेकर सृष्टि के आरंभ तक चारों ओर अंधकार ही अंधकार था और सृष्टि एकदम शून्य थी. तब आदि शक्ति के कुष्मांडा रूप ने अंडाकार रूप में ब्रह्मांड की रचना की थी. मां कुष्मांडा की अराधना करने से भक्तों को रिद्धी-सिद्धी की प्राप्ति होती है.

 

मां कुष्मांडा का स्वरूप

 

 

  • मां कुष्मांडा को आठ भुजाओं के कारण अष्टभुजा कहा जाता है

 

  • इनके सात हाथों में कमण्‍डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्‍प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा है

 

  • मां के आठवें हाथ में जप माला है

 

  • मां कुष्‍मांडा भी शेर पर सवार हैं

 

सच्चे मन से माता के इस रूप की उपासना करने पर सभी रोगों का नाश होता है. कहते हैं, मां के इस रूप की उपासना भक्त के तेज में वृद्धि करती है, मां के तेज के समान उनके भक्त की ख्याति भी दशों दिशाओं में पहुंचती है.

 

कैसे करें मां कुष्मांडा की पूजा

 

  • हरे वस्त्र धारण करके मां कुष्मांडा का पूजन करें
    पूजा के दौरान मां को हरी इलाइची, सौंफ अर्पित करें
    इसके बाद उनके मुख्य मंत्र “ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः” का 107 बार जाप करें

 

  • मां की पूजा के बाद भगवान शंकर की पूजा करना ना भूलें

 

  • इसके बाद भगवान विष्‍णु और मां लक्ष्‍मी की एक साथ पूजा करें

 

  • मां की उपासना से बुद्ध‍ि का विकास होता है और निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है

 

मां कुष्मांडा का निवास स्थल सूर्यलोक माना जाता है. कुष्मांडा की कृपा से उन्नति के नए रास्ते खुल जाते है. मां की पूजा करने के बाद भगवान शिव की पूजा अवश्य करनी चाहिए अन्यथा मां कुष्मांडा की पूजा अधूरी रह जाती है.

 

देवी के इस स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन के तमाम कष्ट दूर हो जाते हैं. अगर किसी शख्स की कुंडली में बुध से जुड़ी परेशानियां हैं तो मां कुष्मांडा की आराधना करने से सभी मुसीबतें दूर हो जाती हैं.

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