यहां शालिग्राम रूप में पूजे जाते हैं भगवान विष्णु , इस स्थान पर श्राद करने से मिलती है मुक्ति

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-नीलम रावत, संवाददाता

नेपाल के थोरांग ला पहाड़ियों की तराई में स्थित है मुक्तिनाथ मंदिर. भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती है. चारों तरफ से खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा ये मंदिर भगवान विष्णु के श्रद्धालुओं को अपनी और आकर्षित करता है.

नेपाल की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित इस ऐतिहासिक मंदिर का संबंध सृष्टि के आरंभ काल से माना जाता है. कहते हैं, यहां भगवान विष्णु को देवी वृंदा के शाप से मुक्ति मिली थी इसलिए यह मुक्ति धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

मुक्तिनाथ धाम से जुड़ी पौराणिक कहानी

पौराणिक कथाओं के अनुसार शालग्राम पर्वत और दामोदर कुंड के बीच सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने मुक्तिक्षेत्र में यज्ञ किया था. इस यज्ञ के प्रभाव से भगवान शिव अग्नि ज्वाला के रूप में और नारायण जल रूप में उत्पन्न हुए थे. ऐसा माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान स्वामी नारायण ने करीब 6 महीने तपस्या करके सिद्धियां प्राप्त की थी.

भगवान विष्णु को शाप से मुक्ति और स्वामी नारायण की तपस्या के कारण हिंदूओं के लिए यह नेपाल के प्रमुख तीर्थों में से एक है. लेकिन इस स्थान पर ना केवल हिंदू बल्कि बौद्ध धर्म को मानने वालों की भी अपार श्रद्धा है.

बौद्ध और हिंदू धर्म की आस्था के कारण ही मुक्तिधाम धार्मिक सहिष्णुता का भी एक प्रमुख केन्द्र है. मुक्तिनाथ धाम का संबंध भगवान बदरीनाथ से भी माना जाता है क्योंकि बदरीनाथ धाम के गर्भगृह में भी शालिग्राम भगवान की पूजा होती है.

शालिग्राम रूप में क्यों पूजे जाते हैं विष्णु

शालिग्राम दरअसल एक पवित्र पत्‍थर होता है जिसको हिंदू धर्म में पूजनीय माना जाता है. यह मुख्‍य रूप से नेपाल की ओर प्रवाहित होने वाली काली गण्डकी नदी में पाया जाता है. पारंपरिक रूप से भगवान विष्‍णु शालिग्राम पत्‍थर के रूप में पूजे जाते हैं.

भगवान विष्णु के शालिग्राम पत्थर में पूजे जाने के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल जब भगवान शिव जालंधर नामक असुर से युद्ध नहीं जीत पा रहे थे तो भगवान विष्‍णु ने उनकी मदद की थी, लेकिन जब तक असुर जालंधर की पत्‍नी वृंदा अपने सतीत्‍व को बचाए रखती तब तक जालंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था, ऐसे में भगवान विष्‍णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्‍व को नष्‍ट करने में सफल हो गए.

इससे दुखी वृंदा ने भगवान विष्णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्यतीत करने का श्राप दे डाला, फलस्वरुप कालांतर में शालिग्राम पत्थर का निर्माण हुआ, जो हिंदू धर्म में आराध्य माना गया.

श्राद्ध करने से मिलती है मुक्ति

नेपाल के मुक्तिधाम के पास गण्डकी नदी और दामोदर कुंड की धारा जहां मिलती है, उसे काकवेणी कहते हैं. ऐसी मान्यता है कि यहां पर श्राद्ध तर्पण करने से व्यक्ति की 21 पीढ़ियों को मुक्ति मिल जाती है. श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार कलियुग के 5,000 वर्ष पूरे होने के बाद गंगा नदी भी स्वर्ग चली जाएगी और केवल जलधारा रह जाएगी. लेकिन तब भी मुक्तिक्षेत्र में बहने वाली गंडक नदी 10 हजार साल तक रहेगी और मुक्ति प्रदान करेगी.

मुक्तिनाथ में नारायणी नदी में सात झरने गरम पानी के हैं…नदी के उद्गम के समीप अग्नि ज्वाला दिखती है. यहां कई मंदिर और धर्मशालाएं हैं. मुक्तिनाथ मंदिर तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है. श्रद्धालुओं को यहां तक पहुंचने के लिए हिमालय पर्वत के एक बड़े हिस्से को पार करना होता है. लेकिन दुर्लभ रास्ते और कठिन चढ़ाई के बावजूद भी श्रद्धालुओं का हौंसला बिल्कुल नहीं ढगमगता और श्रद्धालु भगवान विष्णु के दर्शनों के लिए मुक्तिनाथ मंदिर पहुंच ही जाते है.

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