यहां स्थित है ब्रह्मा जी का इकलौता मंदिर, जानिए क्यों मिला था ब्रह्मा जी को श्राप

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-नीलम रावत, संवाददाता

भगवान तो सर्वशक्तिमान होते हैं. जिनके आगे किसी की नहीं चलती है लेकिन, कई बार ऐसे मौके भी आए, जब भगवान को भी झुकने लिए मजबूर होना पड़ा और उनकी गलती की सजा उन्हें आजतक मिल रही है.

ऐसी ही एक भूल की सजा मिलती है ब्रह्मांड के रचयिता भगवान ब्रह्मा को, जिनकी पूजा कही नहीं होती. ब्रह्मा का इकलौता मंदिर केवल राजस्थान के पुष्कर में मौजूद है. सृष्टि की रचना परमपिता ब्रह्मा ने की, यह तो सभी जानते हैं. लेकिन एक बार ब्रह्मा से भी भूल हो गई थी. एक ऐसी भूल, जिससे उनकी पत्नी न सिर्फ उनसे रूठ गईं, बल्कि हमेशा-हमेशा के लिए उनका साथ भी छोड़ गईं. यही नहीं, पत्नी के गुस्से का ही यह परिणाम था कि आज सृष्टि की रचना करने वाले की पूजा सिर्फ पुष्कर में ही होती है.

पत्नी ने दिया ब्रह्मा जी को श्राप

पुष्कर का ये ब्रह्मा मंदिर ना सिर्फ ब्रह्मा और सावित्री के बीच दूरी बढ़ने की कहानी कहता है, बल्कि उन दोनों के रिश्ते टूटने के किस्से पर भी मुहर लगाता है. दरअसल, परमपिता ब्रह्मा और सावित्री के बीच दूरियां उस वक्त बढ़ीं, जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए पुष्कर में यज्ञका आयोजन किया. इस यज्ञ में पत्नी का बैठना जरूरी था, लेकिन सावित्री को पहुंचने में देरी हो गई.

कहते हैं कि जब शुभ मुहूर्त निकलने लगा, तब कोई उपाय न देखकर ब्रह्मा ने नंदिनी गाय के मुख से गायत्री को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ पूरा किया. उधर सावित्री जब यज्ञस्थली पहुंचीं, तो वहां ब्रह्मा के बगल में गायत्री को बैठे देख क्रोधित हो गईं और उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दे दिया.

सावित्री का गुस्सा इतने में ही शांत नहीं हुआ. उन्होंने विवाह कराने वाले ब्राह्मण को भी श्रापदिया कि चाहे जितना दान मिले, ब्राह्मण कभी संतुष्ट नहीं होंगे. क्रोध शांत होने के बाद सावित्री पुष्कर के पास मौजूद पहाड़ियों पर जाकर तपस्या में लीन हो गईं. कहते हैं कि यहीं रहकर सावित्री भक्तों का कल्याण करती हैं.

पुष्कर में सावित्री का मंदिर

पुष्कर में जितनी अहमियत ब्रह्मा की है, उतनी ही सावित्री की भी है. सावित्री को सौभाग्य कीदेवी माना जाता है. यह मान्यता है कि यहां पूजा करने से सुहाग की लंबी उम्र होती है. यही वजह है कि महिलाएं यहां आकर प्रसाद के तौर पर मेहंदी, बिंदी और चूड़ियां चढ़ाती हैं और सावित्री से पति की लंबी उम्र मांगती हैं. सावित्री मंदिर तक पहुंचने के लिए कई सीढ़ियों को पार करना पड़ता है.

पुष्कर झील का महत्व

मन्दिर के पास ही झील है जिसे पुष्कर झील के नाम से जाना जाता है. कहते हैं जब यज्ञ के स्थान को सुनिश्चित करते समय ब्रह्मा जी के हाथ से कमल का फूल पृथ्वी पर गिर पड़ा. इससे पानी की तीन बूदें पृथ्वी पर गिर गई, जिसमें से एक बूंद पुष्कर में गिरी थी। इसी बूंद से पुष्कर झील का निर्माण हुआ.पुष्कर हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थो में से एक है. पुष्कर झील का महत्व काशी और बनारस जैसा ही है. कहते है कि चार धाम की यात्रा तब तक पूरी नहीं होती जबतक पुष्कर के पवित्र जल में स्नान नहीं किया जाता.

 

कब हुआ मंदिर का निर्माण

ब्रह्मा जी के मंदिर का निर्माण कब हुआ और किसने किया इसका कहीं पर कोई उल्लेख नहीं दिया गया है. लेकिन ऐसा कहते है की आज से तकरीबन 1 हजार 200 साल पहले अरण्व वंश के एक शासक को एक सपना आया था कि इस जगह पर एक मंदिर है जिसके सही रख-रखाव की जरूरत है. तब राजा ने इस मंदिर के पुराने ढांचे को दोबारा जीवित किया.

कार्तिक पूर्णिमा पर भव्य मेला

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन यज्ञ किया था. इसलिए हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है. देश-विदेश से इस मेले में शामिल होने के लिए लोग आते हैं. मेले के दौरान ब्रह्मा जी के मंदिर में हजारों की संख्या में भक्तों की भीड़ लगी रहती हैं.

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