दक्षिण में भगवान कार्तिकेय का सबसे विशाल मंदिर, जानिए क्यों दक्षिण में बसे भगवान कार्तिकेय

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-नीलम रावत, संवाददाता

भगवान कार्तिक महादेव और माता पार्वती के पुत्र है. हिंदू धर्म में दूसरे देवी देवताओं के समान ही भगवान कार्तिकेय की अराधना की जाती है. लेकिन सबसे अधिक भगवान कार्तिकेय को दक्षिण भारत में पूजा जाता है.

शिव पुत्र कार्तिकेय को दक्षिण भारत में मुरुगन कहा जाता है. कार्तिकेय का सबसे विशाल व प्रसिद्ध मंदिर भी दक्षिण में ही है. तमिलनाडु के पलनी डिंडिगुल जिले का एक शहर है. यहां मुरुगन स्वामी का मंदिर स्थित है. दूर-दराज से भक्त इस मंदिर में मुरुगन के दर्शन करने आते है. दक्षिण भारत के लोग तो पलानी में स्थित मुरुगन के इस मंदिर में जाना कभी नहीं भूलते.

दक्षिण में क्यों बसे भगवान कार्तिकेय

कार्तिकेय के दक्षिण में बसने के पीछे कई कहानियां मिलती है. जिसमें से एक कहानी ज्ञान के फल से जुड़ी हुई है. मान्यता है कि एक बार नारद मुनि कैलाश पर्वत पर एक फल लेकर पहुंचे. यह ज्ञान का फल था. शिव ने यह फल अपने दो बेटों गणेश और कार्तिकेय को दिया, पर मुनि को मंजूर नहीं था कि फल को दो हिस्सों में काटा जाए. तो यह तय हुआ कि जो तीन बार पृथ्वी की परिक्रमा पहले कर लेगा, उसे वह फल मिलेगा.

जिसके बाद कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा पर निकल पड़े, पर गणेश पिता शिव और माता पार्वती की परिक्रमा करने लगे. शिव ने वह फल गणेश को दे दिया जिसके बाद नाराज कार्तिकेय ने कैलाश पर्वत छोड़ दिया और दक्षिण भारत की पलनी पहाड़ी पर आकर अपना निवास बनाया. कहते हैं कि कार्तिकेय साधु वेश में यहां तपस्या करने लगे. इसी स्थान पर बाद में शिव-पार्वती खुद कार्तिकेय को आशीर्वाद देने आए थे.

मुरुगन स्वामी मंदिर की खास बातें

  • पलनी मुरुगन स्वामी मंदिर का निर्माण चेरा राजाओं ने करवाया था
  • इसके मुख्य गोपुरम को सोने से मढ़ा गया है
  • मंदिर का परिसर काफी विशाल है, परिसर की दीवारों पर सुंदर कलाकृतियां बनाई गई हैं
  • मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 689 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है
  • विशाल प्रांगण में पहुंचने के बाद दर्शन के लिए दर्शनार्थी भक्तों को तीन कतारों में बंटना पड़ता है
  • दरअसल ये कतारें शुल्क के आधार पर बंटी होती हैं
  • मंदिर के गर्भगृह के अंदर किसी को जाने की इजाजत नहीं है

ऋषि बोगार की समाधि

मुख्य मंदिर के दाहिनी तरफ ऋषि बोगार की समाधि है. पलनी की चर्चा तमिल के संगम साहित्य में आती है. पलनी की कहानी 3 हजार ईसा पूर्व के सिद्ध ऋषि बोगार से जुड़ी हुई है. वे आयुर्वेद के बड़े विद्वान थे. पलनी वही स्थान है, जहां उन्होंने नौ भस्म से दवा तैयार की थी. ऋषि बोगार ने पलनी के शिवगिरि पर्वत पर मुरुगन स्वामी की प्रतिमा स्थापित की और दूध-पंचामृत से उनका अभिषेक करने लगे और तभी से भक्त इस स्थान पर मुरुगन के दर्शन के लिए आने लगे.

श्रद्धालु मयूर पंख सिर पर सजाकर और कुछ लोग मुंडन कराकर पलनी पहुंचते हैं. दूर दराज से भक्त इस मंदिर में अपने मुरुगन स्वामी के दर्शन करने आते हैं और उनका आशीर्वाद लेकर जाते हैं.

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