भगवान शिव ने यहां तोड़ा था अपना त्रिशूल ,खंडित त्रिशूल की आज भी होती है पूजा!

-करिश्मा राय तंवर

 

धार्मिक मान्यता के आधार पर हम सबको पता है कि भगवान शिव को अपना डमरू, नाग, मुंडमालाएं और त्रिशूल अत्यंत प्रिय है वह कभी इनको खुद से अलग नहीं करते हैं. शिव के स्वरूप में यह सब सम्मिलित है लेकिन क्या आपको पता है कि भोलेनाथ का ऐसा मंदिर भी है जहां पर उनका खंडित त्रिशूल स्थापित है. जी हां, वैसे तो भगवान शिव के कई अनोखे मंदिर हैं, लेकिन पटनीटॉप के पास स्थित शंकर जी का सुध महादेव का मंदिर शिव के प्रमुख मंदिरों में से है. पौराणिक ग्रंथों में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है. आज हम आपको इस मंदिर से जुड़ी खास बातें और प्राचीन कथा के बारे में बताएंगे…

 

 

यू तो आमतौर पर खंडित प्रतिमा और अस्त्रों का पूजन नहीं किया जाता लेकिन महादेव के इस पवित्र धाम में श्रद्धालु दूर-दराज से आते हैं. भारत में भगवान शिव का ऐसा मंदिर मौजूद है जहां उनके खंडित त्रिशूल की आज भी पूजा-अर्चना की जाती है.

 

जम्मू से 120 किलोमीटर दूर पटनीटॉप के पास सुध महादेव का मंदिर स्थित है. इस मंदिर को शुद्ध महादेव भी कहा जाता है. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर एक विशाल त्रिशूल के तीन टुकड़े जमीन में गड़े हुए हैं जो कि पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वयं भगवान शिव के हैं.

 

सुध महादेव का ये मंदिर लगभग 2800 साल पुराना है. जिसका पुनर्निर्माण लगभग एक शताब्दी पहले एक स्थानीय निवासी रामदास महाजन और उनके पुत्र ने करवाया था. इस मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग, नंदी और शिव परिवार की मूर्तियां भी मौजूद है.

 

 

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कहानी

माता पार्वती अपनी जन्मभूमि मानतलाई में अक्‍सर पूजा करने आया करती थीं. एक बार जब वह यहां पूजा-अर्चना करने आईं तो उनके पीछे-पीछे सुधांत नाम का राक्षस भी आ गया. वह भी शिव भक्त था और पूजा करने आया था. जैसे ही पूजा करने के बाद मां पार्वती ने अपनी आंखें खोली, तो राक्षस को देखकर उनकी चीख निकल गई. मां पार्वती की आवाज सुनकर महादेव का लगा कि वो खतरे में है. महादेव ने अपना त्रिशूल मां पार्वती की दिशा में फेंक दिया. जो सुधांत राक्षस के सीने में जा कर लगा. तब महादेव को लगा कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गई.

 

मंदिर का नाम पड़ा सुध महादेव

इसके बाद भगवान शिव स्वंय उस जगह पर प्रकट हुए. महादेव ने सुधांत को जीवनदान देने की पेशकश की लेकिन सुधांत ने इनकार कर दिया. सुधांत अपने ईष्टदेव के हाथों प्राण गंवाकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता था. जिसके बाद भगवान शिव ने उसकी बात मानते हुए उसे आशीर्वाद प्रदान किया. महादेव ने सुधांत को आशीर्वाद दिया कि आज से ये जगह तुम्हारे नाम यानि सुध महादेव के नाम से जानी जाएगी. साथ ही शंकर भगवान ने उस त्रिशूल के तीन टुकड़े करके वहीं गाड़ दिए जो आज भी देखे जा सकते हैं

 

 

यह त्रिशूल मंदिर परिसर में खुले में गड़े हुए हैं और यहां आने वाले भक्त इनका भी जलाभिषेक करते है. मंदिर के बाहर ही पाप नाशनी बाउली है जिसमें पहाड़ों से 12 महीनों पानी आता रहता है. ऐसी मान्यता है कि इसमें नहाने से सारे पाप नष्ट हो जाते है. मंदिर से 5 किलोमीटर की दूरी पर माता पार्वती की जन्म भूमि मानतलाई है। यहीं पर माता पार्वती का जन्म और शिव जी से उनका विवाह हुआ था। यहां पर माता पार्वती का मंदिर और गौरी कुण्ड भी देखने लायक जगह है। सावन मास की पूर्णिमा पर यहां मेला लगता है, इस मेले में देश भर के दूर-दूर से सुध महादेव के दर्शन करने आते हैं।

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