कोविड में भी दिखी विजय दशमी की धूम, कई जगह सन्नटा सा पसरा

Share

अक्षत सरोत्री

देश के कई शहरों में विजय दशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया गया। इस बार कोरोना के चलते लोग कम घरों से निकले लेकिन उसके बाबजूद फिर भी कुछ जगहों पर लोगों ने विजय दशमी में रावण दहन का पूरा आनंद लिया। कई स्थानों पर वर्चुअल तरीके का प्रयोग करके रावण दहन किया गया। देश के कई हिस्सों में तो कई जगह भीड़ भी देखने को मिली। दिल्ली के शास्त्री पार्क में रावण दहन किया गया। शास्त्री पार्क में वर्चुल ढंग से रावण का दहन किया गया। नॉएडा के कई हिस्सों में रावण दहन किया गया।

ऐशबाग में 121 फुट के रावण का होगा दहन

विजय दशमी के दिन राजधानी के ऐशबाग स्थित रामलीला मैदान में 3 मिनट के आतिशबाजी के बाद 121 फीट के रावण का दहन किया। इस दौरान डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और गवर्नर राम नाईक भी मौजूद रहे। कैबिनेट मिनिस्टर ब्रिजेश पाठक भी साथ दिखाई दिए।

फर्रुखाबाद

​क्रिश्चियन इंटर कालेज के मैदान में राम रावण का युद्ध कई घंटों तक चला। इस दौरान सभी दर्शकों ने जय श्रीराम के नारे लगाए। रामलीला के खत्म होते ही रावण दहन किया गया। आतिशबाजियों से सारा माहौल गूंज उठा।

वाराणसी

वाराणसी में डीरेका स्टेडियम में इस बार 75 फीट के रावण, 65 फीट कुंभकारण और 70 फीट ऊंचे मेघनाथ का पुतला फूंका गया पुतले की खास बात ये थी कि इनको बनाने वाले सभी कारीगर मुस्लिम समुदाय के थे।

आयोध्या

आयोध्या में भी विजय दशमी की धूम रही। लोगों ने बढ़ चढ़ कर विजय दशमी को देखने व् रावण दहन देखने के लिए आगे आये।

विजय दशमी का महत्व

दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय ना मानकर, लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां यह पर्व पूरे 75 दिन चलता है। यहां दशहरा श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। प्रथम दिन जिसे काछिन गादि कहते हैं, देवी से समारोहारंभ की अनुमति ली जाती है। देवी एक कांटों की सेज पर विरजमान होती हैं, जिसे काछिन गादि कहते हैं। यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं।

एक स्थान ऐसा भी जहाँ नहीं जलाया जाता है रावण

दशहरे का त्योहार पूरे देशभर में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के तौर पर रावण के पुतले को जलाते हैं लेकिन हिमाचल प्रदेश का एक शहर ऐसा भी है। जहां रावण दहन नहीं किया जाता। यहां के लोगों मानते हैं कि ऐसा करने से भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। यह शहर है कांगड़ा का वैजनाथ।

कई तरह की हैं मान्यताएं

मान्यताओं के अनुसार रावण ने कई वर्ष पहले यहां घोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न कर शिवलिंग स्थापित किया था। इसी कारण से यह स्थान रावण की तपोभूमि माना जाता है। ऐसा नहीं है कि कभी यहां पर रावण का पुतला फूंकने की कोशिश नहीं की गई. कई साल पहले कुछ लोगों ने यहां पर रावण का पुतला जलाया था और बताया जाता है कि उनकी कुछ समय बाद ही मौत हो गई। इसी कारण से रावण को सम्मान देते हुए यहां पर दशहरा पर्व न मनाने का प्रचलन चल पड़ा।

जलालाबाद में दिखी भीड़

पंजाब के जलालाबाद में भी दशहरा मनाया गया। स्थानीय विधायक ने विजय दशमी पर पूजा अर्चना की। लेकिन यहाँ जो हालत देखने को मिली उसमें कोरोना के इस दौर में किसी व्यक्ति ने मास्क तक नहीं पहना था और तो और पुलिस प्रशाशन के लोग मूकदर्शक बन कर खड़े थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *